मैं देखना चाहती हूं
मैं देखना चाहती हूँ
दुनिया को एक बार दुनिया की नज़र से,
समझना चाहती हूँ
क्यों लड़ते हैं लोग धर्म के असर से।
क्यों अल्लाह, भगवान, जीज़स, वाहेगुरु में
बराबरी नज़र नहीं आती,
क्यों इंसानियत से ऊपर धर्म
हर रोज़ जगह बनाती जाती?
क्यों मंदिर में खज़ाना रखकर
बाहर कोई भूखा सो जाए,
क्यों पकवान चढ़ते अंदर
और बच्चा बाहर रोए?
क्यों दरगाह और गुरुद्वारे में
चादरें चढ़ती जाएँ,
पर बाहर कोई ठंड में
तड़प-तड़प कर मर जाए?
क्यों लोग लाखों दान कर देते
बाबाओं के दरबार में,
और घर के माँ-बाप रहते
भूखे अपने ही संसार में?
क्यों पढ़ा-लिखा इंसान
बेरोज़गार घूमता जाए,
और अनपढ़ धर्म के नाम पर
मौज मनाता जाए?
क्यों अनाथ बच्चे रोते
खाली थाली के दुख में,
और धर्म के नाम पर लोग
पकवान खाएँ सुख में?
नारी को देवी मानकर
मंदिर में पूजा जाए,
फिर वही नारी घर आकर
घूँघट में क्यों ढक दी जाए?
क्यों दुनिया किसी को जीने
की आज़ादी नहीं देती,
हर कोई किसी के ऊपर
अपनी ताकत रख देता है भारी?
क्यों उम्र का सम्मान नहीं,
यहाँ पैसा ही सब बताए,
कौन कितना बड़ा है—
यह हर रोज़ तराज़ू में तौले जाए?
शायद मैं इसलिए नहीं देख पाती
दुनिया को दुनिया की नज़र से—
क्योंकि जहां ऊपरवाले से ज्यादा खौफ
नीचे वाले से हो जाए
- Bhawana Joshi
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