'आटा साटा' एक कुप्रथा
आटा साटा एक कुप्रथा
सुमन अपने भाई संतोष को लेकर बहुत चिंतित रहने लगी थी। संतोष आज पूरे पैंतीस साल का हो गया पर कोई रिश्तेदार लड़की देने के लिए हाँ नहीं कर रहा। संतोष के पिता सूखकर पतले लकड़ी जैसे हो गए हैं। अब तो आस-पड़ोस वाले भी ताना मारने लगे हैं - इसे कौन लड़की देगा! यह तो कम पढ़ा-लिखा है। आजकल लड़कियाँ पुरा पढ़ा-लिखा लड़का देखती हैं और सरकारी नौकरी भी। घर वालों को भी नखरे बहुत आते हैं, सुमन को बदले में देकर लड़के की शादी करा लेनी चाहिए। लोगों को कहते फिर रहे हैं कि सुमन तो अपने पसंद के लड़के से शादी करेगी, वह 'रीट' की तैयारी कर रही है। ऐसे तो यह संतोष कुंवारा ही रह जाएगा।
सुमन पर आकर बात हर बार अटक जाया करती थी। सुमन का खुद का भी कोई सपना था पर आज तो उसने पक्का ठान लिया कि मुझे अपना सपना मारकर भाई की शादी करानी ही है। सुमन बाबूजी के पास बैठकर धीरे से बोली - बाबूजी, कल वाले मेहमान जाते समय क्या जवाब देकर गए? बाबूजी को गहरी सोच में डूबा देखकर सुमन समझ गई और हिम्मत करके बोली - बाबूजी, उनकी माँग क्या है? बाबूजी थोड़ी देर साँस रोककर बोले - बेटा, उनका कहना है कि तुम सुमन को हमारे लड़के को दो तो हम तुम्हें लड़की देंगे। थोड़ी देर बाद सन्नाटा तोड़ते हुए सुमन बोली- बाबूजी, आप चिंता मत करो। उन्हें संदेश भेज दो कि शर्त मंजूर है।
दोनों बच्चों का अटा-सटा करके विवाह हो जाने के बाद थोड़े दिनों तक घर में सुकून रहा........।
परमेसरी बहुत समझदार थी, इसलिए संतोष कर लिया पर सावन के बाद फिर जब संतोष की पत्नी दूसरी बार ससुराल आई तब उसने अपने भाई को दोष देना और संतोष में कमियाँ निकालनी शुरू कर दिया। घर में रोज़ कलह रहने लगी। "घर का क्लेश दबाने से कभी नहीं दबता। आखिर में उसे सुलझाने के बाद ही शांत होता है।" बुजुर्गों की पंचायत भी बैठी पर संतोष की पत्नी ने सामने बोलकर फैसला मानने से इंकार कर दिया। बात तलाक तक पहुँच गई। यह समाचार जब सुमन तक पहुँचा तो उसने मायके आकर फिर से पंचायत बुलाई और पंचायत में खड़ी होकर अपना पक्ष रखा। सुमन की बात में पीड़ा भी थी व सीख भी। सुमन हाथ जोड़कर बोली - "मैंने एक कोशिश की, पर मेरी कोशिश सफल नहीं हुई। हर अटा-सटा की तरह यह अटा-सटा भी बर्बाद होने के करीब आ गया। अब मैं ससुराल जाने से मना करूँ तो दुःख कम होने की जगह बढ़ेगा। ससुराल जाऊँ तो भाई का घर बंद का बंद रह गया। मैं मेरा घर बसाना चाहती हूँ और समाज से अरज करती हूँ कि वह मुझपर दबाव न बनाए और घर फूटने की इस परिपाटी को रोके। आगे से अटा-सटा को रोकने की हिम्मत करें! शादी की शर्त नौकरी ही नहीं बनाकर रोजगार को बनाना चाहिए। समाज में बढ़ती विकृतियों को रोकें!
सब ने ही सुमन की बात का समर्थन किया और सुमन को ससुराल भेजने की तैयारी शुरू कर दी।
- राधेश्याम जोशी कोहिणा
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